नई दिल्ली,30 जून। ईरान युद्ध से देश में उपजे पेट्रोल-डीजल और गैस की किल्लत से बचने के लिए मोदी सरकार एक मास्टर प्लान पर काम कर रही है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार अब कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी की स्ट्रेटजिक रिजर्व क्षमता बनाने की योजना पर काम कर रही है। यह इतनी बड़ी होगी कि देश की एक महीने की घरेलू मांग को पूरा कर सके। इस कदम का मकसद फारस की खाड़ी में युद्ध जैसी स्थितियों से पैदा होने वाली सप्लाई संकट से बचना है। रिपोर्ट के मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय ने इसके लिए एक समिति गठित की है, जो संभावित स्थानों, ऑपरेटिंग मॉडलों और ओवर ग्राउंड और अंडर ग्राउंड स्टोरेज के बीच विभाजन जैसे डिटेल्स की स्टडी करेगी। यह जानकारी मामले से परिचित लोगों ने दी है, हालांकि चर्चा सार्वजनिक नहीं होने के कारण उन्होंने नाम न छापने की शर्त रखी है। दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश पर अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बाद सबसे अधिक असर पड़ा है, खासकर जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग पूरी तरह बंद हो गया था। इस संकट ने मीडिल ईस्ट से ऊर्जा आयात पर भारी निर्भरता की कलई खोल दी और साथ ही यह भी दिखा कि मौजूदा भंडार कितने सीमित थे, जिन्हें बफर के रूप में काम करना चाहिए था। हालांकि, पेट्रोलियम मंत्रालय ने इस योजना पर ब्लूमबर्ग के पूछे गए सवालों का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। फिलहाल भारत के पास करीब 39 मिलियन बैरल का स्ट्रेटजिक क्रूड ऑयल रिजर्व है, जो लगभग आठ दिनों के आयात के बराबर है। यह एशिया की दूसरी बड़ी ऊर्जा खपत वाली ताकत चीन के मुकाबले बहुत कम है, हालांकि रिफाइनरियों और रिटेलर्स के पास मौजूद इन्वेंट्री मिलकर 70 दिनों से अधिक की तेल मांग को पूरा कर सकती है। स्ट्रेटजिक रिजर्व की क्षमता को पहले से ही बढ़ाया जा रहा है। देश के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर भूमिगत गुफाओं के माध्यम से यह क्षमता मौजूदा भंडार से दोगुनी से अधिक हो जाएगी, और यह काम करीब पांच साल में पूरा होने की उम्मीद है। अंतिम लक्ष्य कम से कम 120 मिलियन बैरल भंडारण क्षमता हासिल करना है।हालांकि, एलपीजी और एलएनजी का भंडार लगभग न के बराबर है, क्योंकि दोनों को संग्रहित करना मुश्किल होता है। एलपीजी को दबाव में लिक्विड के रूप में रखा जाता है, जबकि एलएनजी को बहुत ही अधिक ठंडे तापमान पर रखना पड़ता है।
दोनों के लिए रिसाव या विस्फोट से बचने के लिए सख्त सुरक्षा नियमों की जरूरत होती है।
बेंगलुरू स्थित थिंक-टैंक तक्षशिला संस्थान के अनुसार, भारत की लंबी अवधि के एलपीजी भंडारण क्षमता मात्र 1,40,000 टन है, जो मुख्यतः पूर्वी और पश्चिमी तटों पर भूमिगत चट्टानी गुफाओं में है और यह पूरे देश की खपत के करीब दो दिनों के बराबर ही है।

