खेल गतिविधियों में चल रहा स्वर्णकाल का दौर…

80वीं स्वतंत्रता दिवस: भारत खेलकूद संसार में स्थापित होने प्रयासरत

ब्रिटेन के ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा 1757 से 1858 तक फिर 1858 से 1947 तक ब्रिटिश शासकों द्वारा भारत पर शासन किए जाने के लगभग 190 वर्षों बाद भारत ने 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाई। भारत में इस 190 वर्षों के दौरान रेल, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य,सिंचाई,
राजस्व, उद्योग आदि क्षेत्रों में कई प्रकार की रणनीति अपनाई, निर्माण व नियम बनाए, कुप्रथाओं से समाज को मुक्ति दिलाने में भारतीयों की मदद ली गई. विभिन्न धर्म के लोगों के बीच आपसी एकता बनाए रखने में वे जैसा चाहते थे असफल रहे और धर्म व भावना के आधार पर भारत में अंग्रेजों ने फूट करो राज करो की नीति अपनाई. आखिरकार वृहत भारत का विभाजन पाकिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर और भारत में करने में कामयाब हुए । भारत में अंग्रेज वस्तुत: व्यापार करने आये थे और उन्होंने हमारे देश की बहुमूल्य कीमती वस्तुओं को समुद्र के जरिए ब्रिटेन ले जाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। इस दौरान हमारे देश में सबसे बड़ा नुकसान अंग्रेजों द्वारा हमारे नौजवान साथियों के भविष्य के साथ किया गया। भारतीय खेल मीडिया ने भले ही इस बात की ओर कभी ध्यान नहीं दिया ना ही किसी खेल पत्रकार, विचारक, प्रशासक, विशेषज्ञ, भूतपूर्व खिलाड़ियों ने इस बारे में कोई स्पष्ट संदेश दिया कि अंग्रेजी शासन काल में चूंकि भारतीय बच्चे, किशोर से लेकर युवा सभी भारत की स्वतंत्रता आंदोलन में व्यस्त रहे अत: हमारे देश में खेलों का विकास नहीं हो सका। अंग्रेज सैनिक अपने-अपने कैंप में फुटबाल, हाकी, क्रिकेट, बैडमिंटन, टेनिस खेलने तक सीमित रहे और यही वजह है कि हमारे देश में इन खेलों की देन सेना के अंग्रेज सिपाही, अधिकारियों को दी जाती है। बैडमिंटन की शुरूवात 1860 में पुणे में टेनिस प्रारम्भ हुआ .1880 के दशक में टेनिस उन्होंने लाया .1854 में पहला फुटबाल मैच कलकत्ता में खेला गया। 1850 के दशक में फील्ड हाकी को सैनिकों व अधिकारियों द्वारा जबकि 18 वीं सदी में सबसे पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नाविकों और व्यापारियों द्वारा भारत में लाया गया। इस प्रकार वृहत भारत बिना किसी स्पष्ट खेल नीति के हजारों साल चलता रहा। अंग्रेज शासनकाल में हमारे देश में विदेशी खेलों ने जड़ पकड़ा और भारतीय मूल के खेल कबड्‌डी, खो-खो शतरंज, कुश्ती,गिल्ली डंडा, चौपट, पच्चीसी, पिट्‌टू (सतोलिया) मलखंब, योगासन, कंचा (गोटी), चौपड़,लट्‌टू भौरा, जैसे खेलों को भूला दिया गया।परंतु देशवासियों ने अपने भारत देश को गुलामी की जंजीर से छुड़ाने के लिए अपना जी जान लगा दिया। 1757 से 1858 तक अंग्रेजों ने अपने जाल में भारतीय शासकों को फंसा लिया फिर 1858 से 1947 तक स्वतंत्रता संग्राम में हमारे पूर्वजों ने सब कुछ यहां तक पारंपरिक व पुराने खेलों को भूला दिया। 1947 के बाद हमारे देश की विभिन्न समस्याओं को सुलझाने में शासक लगे रहे और भारत में विदेशी खेलों ने अपना वचर्स्व स्थापित कर लिया। 1947 के बाद भारत के अब तक की अवधि को तीन भागों में बांटा जा सकता है। 1947से 1986 तक हाकी का पराभाव और क्रिकेट का उदय, 1987 से 2014 तक, टेनिस,भारोत्तोलन,क्रिकेट, बैडमिंटन,निशानेबाजी, कुश्ती, मुक्केबाज में सफलता की शुरूवात, फिर 2014 से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद की अवधि में भारत में चूंकि खेलों इंडिया के माध्यम से जमीन से जुड़े खेल प्रतिभाओं की खोज, उनका प्रशिक्षण तथा खेल अधोसंरचना का निर्माण आरंभ हुआ। जिसकी वजह से ओलंपिक खेलों के 14 खेलों में भारत के खिलाड़ी विश्वस्तरीय प्रदर्शन कर रहे हैं। अत: 2014 से अब तक के भारत के खेलकूद की अवधि को स्वर्णकाल कह सकते हैं। आगामी 2047 तक भारत के अमृतकाल में खेलकूद के विश्वमंच पर पहले पांच देशों में स्थान प्राप्त कर लेने के संकल्प के साथ निश्चित ही हमारे देश तथा उसके नागरिक अपने प्रधानमंत्री के संकल्प को पूरा करने के लिए जी जान लगा रहे हैं। 80 वीं स्वतंत्रता दिवस की समस्त खिलाड़ियों व खेल से जुड़ी हस्तियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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