नई दिल्ली।
दक्षिण अफ्रीका की जानी-मानी न्यायविद और मानवाधिकार विशेषज्ञ नवनेथम ‘नवी’ पिल्लई को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की। उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया है। भारतीय मूल के तमिल परिवार में जन्मीं नवी पिल्लई ने रंगभेद के दौर में भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था में अहम भूमिका निभाई।
नवी पिल्लई की जिंदगी इस बात की मिसाल है कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए केवल साहस ही नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष और अपने सिद्धांतों पर टिके रहने की जरूरत होती है। उन्होंने अपना करियर ऐसे समय में शुरू किया, जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की व्यवस्था के कारण अश्वेत लोगों को बुनियादी अधिकारों और समान अवसरों से वंचित रखा जाता था। उन्होंने कानून को उन लोगों की आवाज बनाने की कोशिश की, जिनकी बात सुनने के लिए व्यवस्था तैयार नहीं थी।
नवी पिल्लई के पिता नारायणसामी नायडू और माता संथामा नायडू थे। वे मूल रूप से भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से ताल्लुक रखते थे। नवी पिल्लई के दादा-दादी को 1890 के दशक में गन्ने के खेतों में मजदूरी करने के लिए भारत से दक्षिण अफ्रीका ले जाया गया था। नवी पिल्लई के पिता नारायणसामी एक बस ड्राइवर के तौर पर काम करते थे और अपने परिवार का पेट पालने के लिए दूसरे काम (जैसे मछली पकड़ना) भी करते थे।
नवी पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था। उनका परिवार भारत के तमिल मूल का था। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर में पली-बढ़ीं पिल्लई ने कानून की पढ़ाई की और 1967 में वकालत शुरू की। वह नटाल प्रांत में अपनी स्वतंत्र कानूनी प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं।
वकालत के दौरान उन्होंने रंगभेद का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं और हिरासत में रखे गए लोगों के अधिकारों की पैरवी की। उनका मानना था कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने से उसके बुनियादी अधिकार खत्म नहीं हो जाते। उस दौर में उनके लिए यह लड़ाई केवल कानूनी नहीं, बल्कि समानता और इंसानी गरिमा से भी जुड़ी थी।
भारतीय मूल की नवी पिल्लई को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

