जीवन में खेलकूद के महत्व को स्वीकारने का दिन

मेजर ध्यानचंद का जन्मदिन 29 अगस्त, इस दिन 2012 से प्रतिवर्ष मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवस.
आलेख.. जसवंत क्लॉडियस, वरिष्ठ स्वतंत्र खेल पत्रकार, टीवी कमेंटेटर, रायपुर. (छ ग)

दुनिया में हाकी को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भारत को जाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान वृहद भारत की हाकी टीम ने संसार में अपना परचम लहराया। हाकी को भारत में रोपण का श्रेय भले ही 1855-60 के दौरान भारत में आये ब्रिटिश सैन्य, प्रशासनिक अधिकारियों को जाता है लेकिन हाकी के पौधे को वृक्ष बनाने में भारतीयों का योगदान सबसे प्रमुख रहा। कोलकाता में 1855 में सबसे पहले हाकी के प्रथम क्लब का गठन हुआ। फिर यह मुम्बई तथा पंजाब तक पहुंच गया। कोई खेल तब तक प्रसिद्धि की चरम में नहीं पहुंच पाता जब तक संबंधित खेल की विभिन्न क्लब या स्थानीय टीम के बीच आपसी टकराव से उनकी खूबियों, ताकत की जानकारी आम खेल प्रेमी को न हो पाये। इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए जब कोलकाता में और ब्रिटिशकालीन वृहद भारत के विभिन्न क्षेत्रों में हाकी टीम की संख्या बढऩे लगी तब उनके बीच मुकाबला आवश्यक हो गया। इसी वजह से 1895 में हाकी की पहली चैंपियनशिप की शुरुआत कोलकाता में हुई जिसे बेटन कप नाम दिया गया। इस प्रतियोगिता को प्रारंभ करने का श्रेय पं. बंगाल सरकार के विधिक सलाहकार टी.डी. बेटन को जाता है जिनके अथक प्रयास, मार्गदर्शन तथा आर्थिक सहयोग से बेटन कप स्पर्धा प्रारंभ हुई थी। 20वीं सदी के आरंभ से हाकी को कई देशों द्वारा खेला जाने लगा और इसे पहली विश्वस्तरीय पहचान 1908 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों से मिला जब लंदन में हाकी को शामिल किया गया। 1908 में 6 देशों, 1920 में 4 देशों की टीम ने ओलंपिक में भाग लिया और दोनों बार ग्रेट ब्रिटेन की टीम विजयी हुई। इसी दौरान भारत में हाकी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण हमारे देश में इंडियन हाकी फेडरेशन का गठन 7 नवंबर 1925 को हुआ और अंतर्राष्ट्रीय हाकी संघ से मान्यता के पश्चात भारतीय हाकी टीम ने 1928 के ओलंपिक खेलों में पहली बार भाग लिया तथा स्वर्ण पदक जीता। इस टीम के कई खिलाडिय़ों ने अपने खेल से संसार के खेलप्रेमियों को आकर्षित किया पंरतु स्व. ध्यानचंद के द्वारा स्टिक के माध्यम से गेंद पर नियंत्रण फिर ड्रिब्लिग व छोटे-छोटे पास के द्वारा विपक्षी टीम के खिलाडिय़ों को छकाते हुए गेंद को गोल में डालने की अद्भुत कला ने उन्हें जमीन से आसमान तक की प्रसिद्धि दिला दी। बचपन से अपनी प्रतिभा के बल पर ध्यानचंद ने स्वयं को हाकी और भारत के लिए समर्पित कर दिया। हाकी की विश्वकप स्पर्धा 1971 से आरंभ हुई अत: उसके पहले की ओलंपिक खेलों में हाकी के परिणाम को विश्व विजेता की तरह ही सम्मान दिया जाता था अत: ओलंपिक में 1928 से 1960 को छोड़कर 1964 तक स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम को हाकी का विश्व विजेता भी स्वीकार किया जाना चाहिए। चूंकि 1928, 1932, 1936 तक भारतीय टीम के स्तंभ स्व. ध्यानचंद रहे उनके नेतृत्व, सहयोग से भारत हाकी के माध्यम से भी खेलों की दुनिया में भारत का नाम रोशन हुआ। अत: स्व. ध्यानचंद को भारत का महान खिलाड़ी माना जाता है। हॉकी में उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण भारतीय सेना में उन्हें मेजर पद पर नियुक्त किया गया। उनका जन्म 29 अगस्त 1905 तथा निधन 9 दिसम्बर 1979 को हुआ था। अत: उनके जन्म दिवस को इस महान खिलाड़ी के सम्मान में केंद्र सरकार द्वारा प्रतिवर्ष राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाये जाने का निर्णय लिया गया. मेजर ध्यानचंद ने 1926 से 1949 तक 185 मैच में 570 गोल किए। सेंटर फारवर्ड की पोजिशन से खेलने वाले 5 फुट 7 इंच ऊंचे मेजर ध्यानचंद को केंद्र सरकार द्वारा 1956 में पद्म भूषण द्वारा सम्मानित किया गया। आर्थिक तंगी और अभाव को मेजर ध्यानचंद ने अपनी इच्छा शक्ति से पराजित किया और भारत माता के सपूत बने। राष्ट्रीय खेल दिवस 2026 के दिन उनके द्वारा हाकी के माध्यम से सारे जगत में भारत का झंडा लहराने के लिए उन्हें समस्त देशवासियों की ओर से शत् शत् नमन।

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