11 जून, अंतर्राष्ट्रीय खेल दिवस- संयुक्त राष्ट्र बाल कोष का प्रतिवर्ष का आयोजन.
संयुक्त राष्ट्र परिषद के अंतर्गत बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य करने वाली संस्था की स्थापना 11 दिसम्बर 1946 को की गई थी। इसका प्रारंभिक नाम यूनीसेफ अर्थात यूनाईटेड नेशंस इंटरनेशल चिल्ड्रेंस इमरजेंसी फंड है इसकी भूमिका दुनिया के तमाम बालक-बालिकाओं के शारीरिक, मानसिक विकास को समर्पित है। 1953 में इस संस्था का नाम बदलकर हिंदी में संयुक्त राष्ट्र बाल कोष कर दिया गया। इस संस्था का उद्देश्य संसार के सभी देशों के जरूरतमंद बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा लिए काम करना है। यह संस्था 190 देशों में कार्य करता है।
कई बार देखने में आता है कि कई बच्चे चाहे धनवान या पूर्णत: सक्षम परिवार से हो या फिर आर्थिक पिछड़ेपन में पले बढ़े हो, वास्तव में वे अपने परिवार के सदस्यों, माता-पिता, अभिभावकों से उपेक्षित होते हैं। ऐसे तीन वर्ष तक के बच्चों की भावना को समझने वाला कोई नहीं होता। इसके लिए आज का सामाजिक तानाबाना बहुत जिम्मेदार है. आधुनिक युग में” जीना है यारो तो काम करो प्यारो ” के कारण प्रत्येक शिक्षित नौकरीपेशा पति-पत्नि, माता-पिता अपने कार्यालयीन या निजी कार्यों में व्यस्त रहते हैं या फिर छोटे व आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के परिवारों के बच्चे बचपन से ही पैसा कमाने वाले रोजगार या काम से जुड़े होते हैं। उपरोक्त दोनों ही परिस्थिति में बच्चों के दिल दिमाग में क्या चल रहा है, कोई न तो पढ़ सकते है ,ना ही कोई बता सकता है, ना ही महसूस कर सकता है। विभिन्न शोध और अध्ययन के माध्यम से यह तथ्य साबित होता है कि अकेले होने वाले या उपेक्षित बच्चों का भविष्य मुरझाया हुआ रहता है। मनोवैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि बच्चे अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानीया निकट रिश्तेदार के सानिध्य में पले बढ़े होते हैं वे अपेक्षाकृत उन बच्चों से अधिक व्यवहार कुशल, शालीन, खुशमिजाज होते हैं आने वाला कल ऐसे ही बच्चों का है जो शारीरिक व मानसिक रूप से मजबूत हो। दूसरी तरफ माता-पिता, अभिभावक की भी स्थिति ऐसे ही दुविधापूार्ण है। वे भी आधुनिक युग के भागमभाग में उलझे हुए हैं। कहीं पदोन्नति, कही आगे बढ़ने की चाह सभी ने मिलकर नौकरीपेशा माता-पिता को अपने जाल में फंसा लिया है. आखिर एक मनुष्य होने के नाते अभिभावकों का भी हक बनता है कि वे भी उलझन भरी जिंदगी से थोड़ा हंस ले, मुस्कुरा ले। इस तरह उपरोक्त ढंग से परिवार /समाज में हो रहे परिवर्तन को देखते हुए यूनीसेफ और लेगो फाउंडेशन जैसे संगठनों के प्रस्ताव के पश्चात संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 जून 2024 को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय खेल दिवस मनाने का निश्चय किया। तब से अब यह परंपरा लगातार जारी है। इसको मनाने का प्रमुख कारण और उद्देश्य बच्चों को खेलने का मौलिक अधिकार सुरक्षित करना है जिसमें स्कूल नहीं जाने वाले तीन वर्ष तक के बच्चों के साथ घर पर ही या आसपास के बगीचे या निवासरत घर के आंगन में माता-पिता, अभिभावकों या रिश्तेदारों के साथ बच्चों को मनोरंजन भरा छोटा खेल दो से तीन घंटे खेलना होता है। इसमें आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व के खेल जैसे आंखों में पट्टी बांधकर दूसरे साथियों, भाई-बहनों को खोजने का खेल शामिल है। रंगों को बतलाते हुए रंगों की पहचान या फिर पेंटिंग के माध्यम से हरियाली, पर्यावरण के महत्व को समझाया जा सकता है। लाल, पीला, हरा रंग के महत्व को आवागमन, परिवहन के संदर्भ में बतलाया जाता है, ताकि बच्चे बड़े होकर उसका पालन करे और दुर्घटना से बच सके। अत: स्पष्ट है कि खेल मात्र मनोरंजन नहीं बच्चे इससे जागरूक होते हैं। उनमें आपसी सहनशीलता, सहयोग और नेतृत्व करने की क्षमता व चुनौती को सामना करने का गुण विकसित होता है। 2025 के अंतर्राष्ट्रीय खेल दिवस 11 जून का थीम” खेल चुने- हर दिन” था। 2026 का थीम” खेल की रक्षा में – बचपन की रक्षा करें” है। 2024 में पहले खेल दिवस 11 जून का थीम था “खेल हम सभी को एकजुट करता है”। स्पष्ट है बचपन से ही खेलों के महत्व को प्रत्येक मनुष्य को समझना अनिवार्य है।
खेल की रक्षा से बचपन का साक्षात्कार

