खेलकूद में उपलब्धि के लिए अब भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रयास तेज
आलेख . जसवंत कुमार क्लॉडियस,वरिष्ठ स्वतंत्र खेल पत्रकार, टीवी कमेंटेटर, रायपुर, छत्तीसगढ़.
इतिहास के पन्ने को पलटने से साफ हो जाता है कि अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट में भारत की ऐतिहासिक सफलता का अवसर कभी कभी आया है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय खिलाडिय़ों के विश्व मंच में उल्लेखनीय कामयाबी की बात करें तो हाकी में 1948, 1952, 1956, 1964, 1980 के ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी दल के उस कमाल को कोई भूला नहीं सकता जिसमें हमारे खिलाडिय़ों ने स्वर्ण पदक जीता था। 1975 में एक बार फिर हाकी विश्वकप के विजेता बने। 1952 के ओलंपिक खेलों में पहलवान के डी जाधव ने कांस्य पदक जीता। एशियाड खेलों की एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 1958,1962 में मिल्खा सिंह ने 04 स्वर्ण पदक जीता । पीटी ऊषा ने 4 स्वर्ण, 7 रजत पदक जीता। नीरज चोपड़ा ने 2018 में भालाफेंक में स्वर्ण जीता। भारतीय कबडड़ी टीम ने 9 में से 8 बार स्वर्ण पदक जीता। हाकी टीम 1966, 1996, 2014, 2022 में एशियाड में विजेता बनी। अन्य प्रमुख एथलीटों में दुती चंद, हिमा दास की सफलता याद की जाएगी। इसके अलावा ओलंपिक खेलों में टेनिस में लिएंडरपेस, भारोत्तोलन में कर्णम मल्लेश्वरी, कुंजरानी देवी, निशानेबाजी में राज्यवर्द्धन सिंह राठौर, मनु भाकर, अभिनव बिंद्रा, जसपाल राणा,गगन नारंग कुश्ती में सुशील कुमार, बजरंग पुनिया, मुक्केबाजी में एम सी मेरीकाम, विजेंदर सिंह, बैडमिंटन में पी.व्ही सिंधु, सायना नेहवाल, महिला कुश्ती में साक्षी मलिक आदि प्रमुख सितारे जिन्होंने पदक जीते। 1900 के बाद 1924 तक 25 ओलंपिक खेलों में भारत के खाते में महज 41 पदक आए। जबकि एशियाई खेलों के 9 संस्करणों में भारत ने 183 स्वर्ण, 239 रजत तथा 357 कांस्य सहित 779 पदक जीते हैं। इसके अलावा विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं में भारतीय तीरंदाजों, निशानेबाजों, पहलवानों, भारोत्तोलकों, एथलेटिक्स के गिने-चुने खिलाडिय़ों के नाम कमाये हैं। इसी तरह नान ओलंपिक खेलों में शतरंज, खो खो, रोलबॉल आदि खेलों में भारत के विश्वनाथन आनंद, डी गुकेश, आर प्रज्ञानंदा, कोनेरु हम्पी, हरिका ड्रोनावल्ली, आर वैशाली प्रमुख हैं। उपरोक्तानुसार स्पष्ट है कि 100 से 147 करोड़ की आबादी वाले भारत देश की खेल क्षेत्र में मिल उपलब्धि को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। इसी बात को ध्यान में रखते हुए आखिर भारतीय खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट में पदक क्योंं नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं ?आखिर क्या कारण है हमारे खिलाड़ी सेमीफाइनल तक तो पहुंच जाते हैं लेकिन फिर आगे क्यों नहीं बढ़ पाते हैं ?अब खिलाडिय़ों की कमजोरियों का वैज्ञानिक कारण जानने और उसको दूर करने की कोशिश शुरू हो गई है। इस क्रान्तिकारी कदम का आरंभ गुजरात राज्य द्वारा की गई है। भारत में पहली बार किसी राज्य ने भारत के खिलाडिय़ों की नाकामी के लिए स्पोर्ट्स जीनोमिक्स कार्यक्रम शुरू किया है। इसके जरिए खिलाडिय़ों का डीएनए डेटाबेस बनाया जाएगा। ऐसा माना जा रहा है कि डीएनए परीक्षण से प्राप्त जानकारी से खिलाडिय़ों को विश्व स्तर पर सफलता के लिये प्रशिक्षण, खान-पान आदि चुस्त दुरुस्त रखने के लिए योजना तैयार की जाएगी। गुजरात सरकार ने इस वर्ष करीब 2000 जबकि अगले पांच वर्षों में दस हजार खिलाडिय़ों के सैंपल जुटाने का लक्ष्य रखा है। इसमें खिलाड़ियों हर खिलाड़ी का एक प्रोफाइल तैयार होगा। इसका उद्देश्य यह समझना है कि किसी खिलाड़ी की अनुवांशिक विशेषताएं उसकी मांसपेशियों की बनावट, सहनशीलता, मेटाबोलिज्म, व्यायाम के प्रति शारीरिक प्रतिक्रिया, चोट से ठीक होने के उपाय की जानकारी प्रमुख है।अगर हमें विश्वस्तर पर अपनी छाप छोडऩी है तो ऐसे वैज्ञानिक ढंग से जांच का दायरा पूरे भारत वर्ष में बढ़ाना होगा क्योंकि पूरे भारत में प्रशिक्षण, खानपान तो दी जा रही है परंतु कम सफलता मिलने का सही कारण का पर्दाफाश होना जरूरी है।

