खेल मंत्री अरुण साव की पहल पर एंटी डोपिंग शिक्षा और जागरूकता के लिए आन लाइन कार्यक्रम सम्पन्न
आलेख .. जसवंत क्लॉडियस, वरिष्ठ स्वतंत्र खेल पत्रकार, टीवी कमेंटेटर, रायपुर, छ ग .
आज की भागम भाग भरी जिंदगी में प्रत्येक खिलाड़ी दूसरे से आगे निकलना चाहता है। इसके लिए प्रतिभागी कड़ी मेहनत करते हैं तथा लगातार अभ्यास के द्वारा अपने प्रदर्शन को बेहतर करते रहते हैं .अब तो पुरस्कार स्वरूप सम्मान, नकद पुरस्कार, भूखंड, शासकीय या अर्द्धशासकीय नियमित सेवा मिलती है. अतः किसी खिलाड़ी को ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए या फिर राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतने के लिए कई तरह की कोशिश खिलाड़ी के प्रशिक्षक, उनके अभिभावक, माता पिता,परिवार के अन्य सदस्य या दोस्त करते रहते हैं। बड़े औद्योगिक घराने अपने सी.एस.आर. फंड की राशि में शिक्षा, स्वच्छ पेयजल, साफ- सफाई के लिए आबंटित राशि के अलावा कुछ प्रतिशत विशेष परिस्थित में खेल मैदान के उन्नयन, खिलाड़ियों, निर्णायकों के लिए खर्च करने लगे हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि 21 वीं सदी में खेल अधोसंरचना, मैदान, खिलाड़ियों के खान-पान अत्याधुनिक खेल सामग्री, पोशाक आदि पर विशेष रूप से खर्च किया जा रहा है।
खेल अकादमी की स्थापना और उसमें प्रतिभाशाली खिलाड़ियों का चयन करके सुव्यवस्थित ट्रेनिंग देने की सुविधा शासकीय व गैर शासकीय दोनों ही माध्यम दी जा रही है। एक खिलाड़ी को अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले के लायक बनाने फिर उसे पदक जीतने का लक्ष्य लेकर प्रशिक्षण आरंभ होता है। प्रशिक्षण पश्चात प्रतियोगिता के मुकाबले में उतरते ही प्रत्येक खिलाड़ी की कुशलता, शक्ति, फिटनेस, खेल तकनीक की जानकारी का अनुमान हो जाता है। बस यही खिलाड़ी के खेल जीवन का टर्निंग प्लाइंट होता है। इस मोड़ पर आकर प्रतिभागी के प्रशिक्षक, अभिभावक के सामने दो ही बातें आती है कि एक खिलाड़ी को और मजबूत बनाने लगातार उसके खान-पान में अभ्यास में बदलाव लाया जाए दूसरा उसे ऐसी दवा खिलाई जाए जिससे कम मेहनत से खिलाड़ी बेहतर परिणाम दे सके। वास्तव में कौन नहीं चाहता उनके द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ी चैंपियनशिप का खिताब जीते. बस यहीं से खेल जगत में गलत परंपरा की शुरूआत हो जाती है। एक अच्छे खिलाड़ी को अंधकार में धकलने के लिए अपने ही आसपास के लोग काफी हैं। शरीर में स्फूर्ति बढ़ाने के लिए या शरीर को लंबे समय तक चुस्त दुरुस्त रखने के लिए ताकि मैच या पदक जीत सके। खिलाड़ी को ऐसी दवाई दी जाती है जो प्रतिबंधित होती है।
दुर्भाग्य की बात है कि आज ऐसी प्रतिबंधित दवाएं बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं। दूसरी तरफ आज एक दूसरे को पछाड़ने की चाहत में कड़े परिश्रम, त्याग, संयम से खिलाड़ी प्रशिक्षक, अभिभावक दूर होते जा रहे हैं और चैंपियन बनने की आकांक्षा में प्रतिबंधित दवा का इस्तेमाल करना श्रेयस्कर समझ रहे हैं। खेल भावना के विपरीत व्यवहार की बढ़ी संख्या के कारण अब अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक परिषद के अंतर्गत डोपिंग याने प्रतिबंधित दवा के सेवन की जांच पेशाब व मूत्र का नमूना लेकर किए जाने का प्रावधान विभिन्न देशों में प्रत्येक टूर्नामेंट के बाद है। इसलिए जल्द बड़ी सफलता पाने के चक्कर में अपने खेल जीवन को बर्बाद करने वालों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है। भारतीय में प्रतिबंधित दवा का इतना इस्तेमाल किया है कि आज भारत डोपिंग में पकड़े जाने वाले विश्व के देशों में प्रथम स्थान पर आ गया है। विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी वाडा ने बताया कि 2024 में भारत डोपिंग के प्रकरण विश्व में लगातार तीसरी बार प्रथम स्थान पर है। 2024 में डोपिंग के 260 प्रकरण सामने आये। इस मामले में भारत के बाद फ्रांस व इटली का है. 2026 ओलंपिक की मेजबानी के लिए एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रयासरत हैं। दूसरी तरफ यह दागदार उपलब्धि हमारे देश में ओलंपिक या ऐसे ही खेल आयोजन के लिए बहुत बड़ी बाधा बनकर उभरी है। इस दिशा में प्रतिबंधित दवा के प्रयोग से होने वाली हानि और बचने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के खेल मंत्री अरुण साव के नेतृत्व, खेल सचिव यशवंत कुमार के मार्गदर्शन और खेल संचालक श्रीमती तनुजा सलाम की देखरेख में खेल एवं युवा कल्याण विभाग द्वारा गत दिनों खिलाड़ियों व प्रशिक्षकों के लिए आनलाइन एंटी डोपिंग शिक्षा व जागरूकता कार्यक्रम चलाया गया। यह एक सराहनीय प्रयास है जो कि न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि हमारे देश के खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों की जानकारी के लिए अत्यंत लाभप्रद साबित हुई . भारत में खेल के उज्जवल भविष्य को देखते हुए प्रत्येक जिले में ऐसे अभियान चलाया जाना चाहिए।

