भारत की सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ महिला एथलीट को नमन
खेलकूद की दुनिया ने आज विशाल रूप ले लिया है। नये खेलों का आविष्कार लगातार हो रहा है। हमारे देश में एकल, युगल और टीम खेल सभी तरह की स्पर्धा होती है। इसमें आमतौर पर एकल प्रतियोगिता के विजेता को सबसे अधिक प्रतिभाशाली खिलाड़ी माना जाता है। क्योंकि सफलता या असफलता के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होता है। अगर 1896 को भारत के लिए एकल, युगल या टीम खेल में, प्रदर्शन को आधार मान लिया जाए तो 1947 में स्वतंत्रता के पूर्व कोई एक खिलाड़ी व्यक्तिगत खेलों पर भारी पड़ते दिखाई देते हैं तो वे हैं कोलकाता के ब्रिटिश भारतीय एथलीट नार्मन प्रिचर्ड (1875-1929)। जिन्होंने 1900 पेरिस ओलंपिक खेलों में 200 मी. तथा 200 मी. बाधा दौड में भारत के लिए दो रजत पदक जीते। इसके पश्चात टीम खेल याने हॉकी, क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो आदि में भारतीय खिलाडिय़ों ने विश्व विजेता बनने का गौरव हासिल किया। दूसरी तरफ एकल या युगल या तीन खिलाडिय़ों की प्रतिस्पर्धा पर नजर डालें तो शतरंज में विश्वनाथन आनंद, तीरंदाजी में दीपिका कुमारी, बैडमिंटन में पीटी ऊषा, टेनिस में लिएंडर पेस, मुक्केबाजी में एमसी मेरीकाम, निशानेबाजी में अभिनव बिंद्रा, मनु भाकर, भारोत्तोलन में मीराबाई चानू, कुश्ती में सुशील कुमार का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। उपरोक्त में से सिर्फ तीन खिलाड़ी हैं . शतरंज के विश्वनाथन आनंद 1982 से अब तक याने लगभग 43 वर्ष तक देश को अपनी सेवा दे रहे हैं। टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस ने 1988 से 2022 तक 44 वर्ष तक देश को अपनी सेवा दी है। तथा तीरंदाज दीपिका कुमार 2005 से अब तक याने 21 वर्षों से इस खेल के माध्यम से भारत का नाम रोशन कर रहीं हैं। वास्तव में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उपरोक्त तीनों खेलों के संसार में भारत की आन, बान और शान हैं। वर्तमान में तीरंदाज दीपिका कुमारी को विश्व तीरंदाजी प्रतियोगिता में लगातार मिल रही सफलता हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के लिए गौरव की बात है। समाज के बहुत ही पिछड़े वर्ग से आने वाली, आर्थिक कमियों के बावजूद दीपिका की विश्व स्तर पर उपलब्धि की जानकारी इस देश के बच्चों, किशोरों व नौजवानों को होना चाहिए। तीरंदाजी एक ऐसा खेल है जिसमें थोड़ी सी चूक या गलत पूर्वानुमान आपके सपनों को चूर-चूर कर सकता है। सिर्फ 11-12 वर्ष की उम्र जो कि बच्चों के आनंद मनाने का समय होता है उसी दौर 2005 में दीपिका ने तीरंदाजी के खेल को अपना कैरियर बनाने का निर्णय लिया और कम उम्र में अपने आप पर नियंत्रण करके पूरा ध्यान धनुष से छोड़े गये बाण को लक्ष्य भेदने में लगा दिया। गांव के माहौल से अलग होकर शहर के तीरंदाजी प्रशिक्षण केंद्र के रहन-सहन, खान पान में अपने आपको ढालना किसी तपस्या से कम नहीं। दीपिका ने मिले अवसर का भरपूर लाभ उठाया। तीरंदाजी में धैर्य व संयम का योगदान महत्वपूर्ण होता है। मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मैं राष्ट्रमंडल खेल 2010 में डीडी स्पोर्ट्स के लिए तीरंदाजी स्पर्धा की लाइव कामेंट्री सुना रहा था तब दीपिका ने मेरे आंखों के सामने सिर्फ 15 वर्ष की उम्र में महिला रिकर्व का स्वर्ण और टीम का स्वर्ण पदक याने दो पदक जीतकर इतिहास बनाया। सफलता के इस क्रम को दीपिका ने जारी रखा और 2006 से अब तक व्यक्तिगत और टीम रिकर्व के अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप में 21 स्वर्ण, 22 रजत तथा 15 कांस्य अर्थात् कुल 58 अंतर्राष्ट्रीय पदक जीतकर भारत का नाम रौशन किया है। हाल ही में 2026 के तीरंदाजी विश्वकप में शिंघाई में रिकर्व महिला टीम का स्वर्ण पदक अंकित भगत, कुमकुम अनिल के साथ मिलकर जीता। इस तरह आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि तीरंदाजी जैसे खेल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 58 पदक जीतने वाली झारखंड, रांची की दीपिका कुमारी महिला व पुरुष दोनों में भारत की सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ महिला एथलीट हैं।

