नवापारा राजिम । नगर के दिगम्बर जैन समाज के संजय राजू जैन का बीमारी के उपरांत 18 मई रविवार दोपहर 12:30 बजे देह परिवर्तन हुआ उनका अंतिम संस्कार दोपहर 3:30 बजे स्थानीय मुक्तिधाम में किया गया संजय राजू जैन की तीन बेटियां अदिति मुस्कान और श्रुति है पिता की अंतिम इच्छा भी यही थी कि मेरी बेटियां ही मेरा अंतिम संस्कार करें तीनों बेटियां ने अपने पिता का अंतिम संस्कार पूरे विधि विधान पूर्वक किया। नगर के जैन समाज में या पहला मौका था जब किसी कन्याओं ने अपने पिता की मुखाग्नि या अथवा अंतिम संस्कार किया । विदित हो कि बेटे ही नहीं बेटियां भी आज के समय में बेटों की तरह माता-पिता के प्रति पूरा फर्ज निभाती है बेटों की ओर से की जाने वाली धार्मिक रस्मों को निभा रही है पहले पिता को चिता में मुखाग्नि सिर्फ बेटा ही दे सकता था बेटियां चिता को हाथ भी नहीं लगा सकती थीं इस रूढ़िवादी सामाजिक सोच से ऊपर उठकर बेटी अदिति, मुस्कान और श्रुति ने रविवार को अपने पिता का अंतिम संस्कार किया । जब बेटियों ने अंतिम संस्कार किया तो वहां मौजूद हर एक शख्स की आंखों में आंसू आ गए । दरअसल पिता की जब अंतिम यात्रा निकाली तो तीनों बेटियों दोनों बहनों रंजनी और रंजना तथा दामाद हिमांशु आगे आए और अपने पिता ओर भाई की अर्थी को कंधा दिया, यही नहीं बेटियां घर से लेकर मुक्ति धाम तक पिता की शव यात्रा के साथ गई ।शमशान घाट में बेटियों ने पूरे रीति रिवाज के साथ पिता को मुखाग्नि देकर उनकी अंतिम संस्कार किया ।वहीं बेटियों ने अपने दिल को कडा कर सभी रश्म निभाई । बेटियों ने कहा कि उनके पिता उन्हें बेटा ही मानते थे आज उन्होंने अपने अधिकार को पूरा किया संजय राजू जैन का जीवन बहुत ही धर्म पूर्वक बीता, धर्म के प्रति विशेष रूचि थी उन्होंने पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्ध सागर जी महाराज को अपना गुरु मानकर त्यागियो सा जीवन जिया ।उन्होंने कुछ वर्षों तक समाज के बच्चों में संस्कार का बीज रोपण करने धार्मिक पाठशाला का भी कुशल संचालन किया स्वयं स्वाध्याय करते थे और नियमित रूप से समाज के लोगों को स्वाध्याय कराते थे सभी साधु संतों के प्रति अटूट सेवा भाव था उनके आहार विहार और निहार की सभी क्रियाओ में प्रथम पंक्ति में रहते थे ।
बेटियों ने दिया पिता को मुखाग्नि

