रायपुर में प्री दर्शन समिट: स्पिरिचुअल टूरिज्म पर नीति और संभावनाओं पर हुई गहन चर्चा

छत्तीसगढ़ में स्पिरिचुअल टूरिज़्म को नई पहचान दिलाने की दिशा में सोमवार को रायपुर के उद्योग भवन स्थित टूरिज्म विभाग के कॉन्फ्रेंस हॉल में एक अहम राउंड टेबल मीटिंग आयोजित की गई। यह बैठक छत्तीसगढ़ पर्यटन विभाग और DLA (Development Leader’s Allaince) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘प्री दर्शन समिट’ के तहत हुई।

बैठक में धार्मिक, सांस्कृतिक और लोक आस्था स्थलों को पर्यटन से जोड़ने, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, और कम-ज्ञात लेकिन गहराई से जुड़े स्थलों को प्रमोट करने जैसे विषयों पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ।

बैठक में ये प्रमुख मौजूद रहे:
विवेक आचार्य, प्रबंध निदेशक, छत्तीसगढ़ टूरिज़्म बोर्ड
संदीप ठाकुर, DGM, छत्तीसगढ़ टूरिज़्म
जसब्रीत भाटिया, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ ट्रैवल ट्रेड एसोसिएशन (CGTTA)
संकल्प शुक्ला, संस्थापक, DLA
पुरातत्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारी
विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि और निजी क्षेत्र के टूरिज़्म से जुड़े हितधारक
फोकस रहा — “आस्था को अनुभव में कैसे बदलें”
बैठक में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि छत्तीसगढ़ के पास केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि जनजातीय टोटम परंपरा, प्राकृतिक तीर्थस्थल और ग्राम स्तर की श्रद्धा से जुड़े कई अनछुए स्पॉट हैं, जिन्हें बेहतर ढंग से दुनिया के सामने लाया जा सकता है।

विवेक आचार्य का वक्तव्य:
“छत्तीसगढ़ में श्रद्धा सिर्फ पत्थर की मूर्तियों तक सीमित नहीं है।
यह जंगलों, लोक कथाओं, टोटम परंपराओं और स्थानीय आस्थाओं में भी ज़िंदा है।
हमारा प्रयास है कि इन परंपराओं को बिना बिगाड़े, टूरिज़्म से जोड़ें — ताकि
स्थानीय पहचान भी बचे और पर्यटन के ज़रिए आजीविका के रास्ते भी खुलें।”
DLA के संकल्प शुक्ला ने बताया कि दर्शन समिट का उद्देश्य राज्य की विरासत को एक “सस्टेनेबल और सेंसिटिव टूरिज्म मॉडल” में बदलना है, जहाँ स्थानीय लोग भी केंद्र में हों और यात्रियों को ‘सोलफुल एक्सपीरियंस’ मिले।

सुझावों में क्या शामिल रहा:
“Spiritual Circuits” तैयार करने का प्रस्ताव
आदिवासी टोटम स्थलों और लोक-श्रद्धा के केन्द्रों को टूरिज़्म मैप पर लाना
पुरातात्विक धरोहरों और ग्राम देवी-देवताओं के स्थलों को आध्यात्मिक यात्रा में जोड़ना
कमर्शियल टूरिज्म से हटकर ‘स्लो टूरिज्म’ की तरफ बढ़ने की अपील
बैठक का निष्कर्ष साफ था — छत्तीसगढ़ में धार्मिकता सिर्फ मंदिरों में नहीं, जंगल, परंपरा और समुदाय में भी बसती है। इसे समझने और दिखाने की ज़रूरत है।

अगले कुछ हफ्तों में दर्शन समिट की अगली कड़ी और विस्तृत प्रेजेंटेशन प्रस्तावित है, जिसमें नीति-निर्माताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और संस्कृति शोधकर्ताओं को जोड़ा जाएगा।

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