जीवन में हमेशा कल्याण मित्र बनाइए : मनीष सागरजी महाराज

रायपुर (वीएनएस)। टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में बुधवार को चातुर्मासिक प्रचवनमाला में परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने कहा कि मित्रता दिवस को इस बार ऐसा मनाना है कि हमारा कल्याण हो। देव, गुरु और धर्म से हमारी मित्रता हो। कल्याण मित्र से मित्रता हो। माता-पिता से मित्रता हो। धर्मशास्त्र आदि से हमारी मित्रता हो। सभी को यह संकल्प लेना है कि विकारी मित्र से मित्रता नहीं करना है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि

मैत्री और मोह की लड़ाई जीवन में होती है। मैत्री और मोह का भेद जानने से ही कल्याण संभव है। मित्रता दो तरह की होती है। एक मैत्री भावना रूप और दूसरी मोह भावना रूप। मैत्री भावना रूप होती है तो कल्याण मित्र होते हैं और मोह भावना रूप होती है तो पाप मित्र होते हैं।

हर जीव को दो विश्लेषण अपने जीवन में करना चाहिए क्या कल्याणकारी है वह क्या पपकारी है। हमें रुचि से नहीं जीना है, सच्चाई से जीना है। अधिकांश लोगों में विकार है। जब विकारी विकार से जुड़ता है तो मोह मित्र बनते हैं।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जब तक पात्रता, योग्यता का विस्तार नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं होगा।।केवल भावना से कुछ नहीं होगा। यदि पुण्य से धन मिला है तो उस धन को पुण्य में भी लगाना चाहिए। केवल कमाने के पीछे नहीं भागना है। धन का सदुपयोग हो यह भी हमें देखना है।

यह भी विश्लेषण करना है कि धन कम था तो धर्म कितना था और धन अधिक हुआ तो धर्म कितना पहुंचा। केवल धर्म, स्वाध्याय, मंदिर जाने, प्रतिक्रमण करने से ही धर्म नहीं होता। हमारे भाव में क्या चल रहा है, भीतर में क्या चल रहा यही विश्लेषण सदैव करना है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि हिंसा के मार्ग पर नहीं, हमें अहिंसा के मार्ग पर चलना चाहिए। आत्मा की हिंसा नहीं करनी चाहिए। हम अपने भाग्य विधाता स्वयं बनते हैं।

राग और द्वेष ही हिंसा की जड़ है। राग और द्वेष को जितना होगा तभी हिंसा से बचा जा सकता है। द्वेष में तो हम लड़ते हैं पर अपने राग से लड़ना चाहिए। यदि राग से लड़ोगे तो किसी के प्रति द्वेष नहीं होगा। राग ही द्वेष का जनक है। हमारे भीतर का राग ही किसी न किसी के प्रति द्वेष पैदा करता है। इसलिए वीतरागी और विद्वेषी मार्ग पर चलो ऐसा परमात्मा ने संदेश दिया है।

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