खेल में हमारा भविष्य उज्जवल, पर बचे विवादों से

Jaswant Claudius

भाला फेंक के पेराओलंपियन सुमित अंतिल की शिकायत पर कोच बर्खास्त
आलेख .. जसवंत क्लॉडियस, वरिष्ठ खेल पत्रकार, टी वी कमेंटेटर, रायपुर,( छ ग .)

आज स्वस्थ और चुस्त दुरुस्त मनुष्य अपने वर्ग के बराबर के खिलाड़ियों से मुकाबला करते हैं। दूसरी तरफ 100 वर्ष पूर्व शारीरिक रूप से अक्षम चाहे जन्म से हो या दुर्घटना वश ऐसे दिव्यांग खिलाड़ी पूरी तरह सामान्य कद काठी वालों से मुकाबला नहीं कर पाते थे। इस परिस्थिति में खेल की लोकप्रियता और महत्व जीवन में जैसे- जैसे बढ़ती चली गई उसमें अनेक बदलाव होने लगे . खेलकूद की शुरुवात को 7000 वर्ष ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है। वास्तव में सैनिकों या तत्कालीन शासकों के बचाव करने वाले रक्षकों द्वारा शरीर का किसी हमले के लिए या अपने राजा, शासक की रक्षा के लिए नियमित रूप से शारीरिक कसरत की जाती थी उसी को खेल की शुरुआत माना जा सकता है। फिर खेल में प्रतिस्पर्धा आरम्भ हुई . प्राचीनकाल में ईसा पूर्व 776 में यूनान ओलंपिया में पहले ओलंपिक खेलों की जानकारी मिलती है। 1844 में अमेरिका और कनाडा के बीच खेले गये एक क्रिकेट मैच को आधुनिक युग का पहला मैच माना जाता है। इसी तरह 1872 में फुटबाल की पहली अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता 1872 में इंग्लैड व स्काटलैंड के बीच हुई। फिर टेनिस में विंबलडन, क्रिकेट में टेस्ट मैच के बाद 1896 में आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुवात हुई। 1913-17 के प्रथम विश्व युद्ध फिर 1937 से 1945 के बीच दूसरे विश्वयुद्ध हुए। इस तरह के युद्ध से अनेक सैनिक, नागरिक शारीरिक रूप से विकलांग हुए और चिकित्सकों, समाज शास्त्रियों को चिंता इस बात की हुई कि आखिर विकलांग हुए व्यक्तियों के जीवन को किस तरह सामान्य किया जाए? उन्हें तंदुरुस्त रखते हुए, उनके अंदर जीने की चाहत कैसे पैदा की जाए? 1904 सेंट लुईस ओलंपिक खेल में भाग लेने वाले अमेरिकन जॉर्ज आइजर पहले दिव्यांग एथलीट थे फिर हंगरी के ओलिवर हलासी ने 1928-36 तक वॉटर पोलो में भाग लेकर पदक जीता था. लेकिन डॉ. लुडविन गुटमैन नामक न्यूरोलाजिस्ट ने सबसे पहले दिव्यांगों की समस्या को महसूस किया अत: उन्होंने 1948 में सर्वप्रथम स्टोक मैंडेविले गेम्स दिव्यांगों के लिए शुरू की। आखिरकार 1948 लंदन ओलंपिक खेलों में पहली बार दिव्यांगों की तीरंदाजी स्पर्धा हुई। फिर 1960 रोम ओलंपिक से अधिकारिक पैरालिंपिक खेलों का आयोजन हुआ। 1988 सियोल ओलंपिक से यह नियम बन गया कि पैरालिंपिक खेल भी उसी शहर में होंगे जहां ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेल होते हैं।
इधर भारत ने 1968 से तेल अवीव खेलों में भाग लेकर अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग टूर्नामेंट में भाग लेना आरम्भ किया। 1984 से भारत लगातार पैरालंपिक में भाग ले रहा है। परंतु (2016-2024) पिछले एक दशक में भारतीय दिव्यांग खिलाड़ियों ने भारत के लिए अभूतपूर्व प्रदर्शन किया और 2016 रियो ओलंपिक में 4 पदक जीते. 2020 टोक्यो में 5 स्वर्ण सहित 19 पदक जीते। 2024 पेरिस में हमारे पैरा ओलंपियन खिलाड़ियों ने कमाल का प्रदर्शन किया और कुल 29 पदक (07 स्वर्ण,09 रजत,13 कांस्य) जीते । इसमें अवनी लेखरा (निशानेबाजी)
और सुमित अंतिल(भाला फेंक) दो ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने लगातार दो पैरालिंपिक में दो स्वर्ण पदक जीते. सुमित अंतिल वर्तमान में पुरुषों की एफ 64 श्रेणी में विश्व और पैरालंपिक चैंपियन हैं। उनकी इस असाधारण उपलब्धि के कारण उन्हें 2022 में पद्मश्री तथा खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 2015 में एक सड़क दुर्घटना में बाया पैर खोने के बाद उन्होंने भाला फेंक को अपनाया। जिंदगी की राह में ऐसे गंभीर अवसाद को पछाड़ने वाले भारत के वीर के साथ उनके प्रशिक्षक द्रोणाचार्य पुरस्कार प्राप्त नवल सिंह ने जो अमानवीय बर्ताव किया उसको सुमित ने सार्वजनिक किया। वह अत्यंत निंदनीय है। भारत के लिए लगातार दो पैरालिंपिक खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले सुमित अंतिल की शिकायत पर साईं की कार्यवाही की वजह से हमारे देश के अन्य दिव्यांग जनों में खेल में भाग लेने के प्रति लगाव बढ़ाने की दृष्टि से इस आलेख में दिव्यांगों के लिए खेल इतिहास को भी बताया गया है ताकि देश का प्रत्येक दिव्यांग इस जानकारी का लाभ उठाये और राष्ट्रहित में अपना जीवन समर्पित कर सके। कोच नवल सिंह द्वारा सुमित जैसे महान खिलाड़ी को नशे में धुत होकर न सिर्फ उनके साथ गाली गलौच करना बल्कि उनके परिवार के सदस्यों को पीड़ित, प्रताड़ित करना एक दुर्भाग्यजनक घटना है। इसकी शिकायत पर भारत खेल प्राधिकरण (साईं) का नवल सिंह को तत्काल बर्खास्त करने का निर्णय हमारे देश में अन्य खिलाड़ियों तथा प्रशिक्षकों के लिए एक सबक है। खेलकूद जीवन में अनुशासन और समय की पाबंदी सीखाती है। इसके लिए कोच व खिलाड़ी दोनों को ही सजग सतर्क होना चाहिए। हमारे देश में जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन और खेल मंत्री मनसुख मांडविया के अगुवाई में खेलकूद का माहौल बनाया जा रहा है। तो फिर ऐसी घटना का प्रकाश में आना निंदनीय है। कोच, खिलाड़ी सहित खेल से जुड़े समस्त लोगों के लिए जरूरी है कि वे ऐसा कोई कार्य ना करें जिससे हमारे देश को खेल से जोड़ने का जो अभियान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रारंभ किया है। उसमें कोई व्यवधान न आए।

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